नई दिल्ली – भारत ने आज एक ऐतिहासिक और शक्तिशाली विरोध प्रदर्शन का गवाह बना, जब 25 करोड़ से अधिक मजदूरों, 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और विभिन्न किसान संगठनों के समर्थन से, भारत बंद का आयोजन किया गया। यह हड़ताल केंद्र सरकार की कथित “मजदूर-विरोधी, किसान-विरोधी और कॉरपोरेट-समर्थक” नीतियों के खिलाफ एकजुटता का प्रतीक बनी। इसने देशभर में बैंकिंग, डाक सेवाएं, बिजली, परिवहन और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कई राज्यों में लगभग ठप कर दिया। सड़कों पर हजारों प्रदर्शनकारी उतरे, जिन्होंने नारेबाजी, रैलियों और धरनों के माध्यम से अपनी मांगों को जोर-शोर से बुलंद किया। यह बंद न केवल आज की सुर्खियों में छाया रहा, बल्कि अगले तीन दिनों तक समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बने रहने की संभावना है।
हड़ताल का कारण
भारत बंद का आह्वान ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (CITU), इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC), हिंद मजदूर सभा (HMS) और अन्य प्रमुख ट्रेड यूनियनों के एक संयुक्त मोर्चा ने किया। यह हड़ताल पिछले साल केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया को सौंपे गए 17-सूत्री मांगपत्र के जवाब में आयोजित की गई थी, जिस पर सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई न होने का आरोप यूनियनों ने लगाया। इन मांगों में शामिल हैं:
- नए श्रम कानूनों का विरोध: चार नए श्रम संहिताओं को यूनियनों ने मजदूर-विरोधी करार दिया है। उनका दावा है कि ये कानून काम के घंटे बढ़ाने, यूनियन गतिविधियों पर अंकुश लगाने और नौकरी की सुरक्षा को कमजोर करने के लिए बनाए गए हैं।
- सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण: बिजली वितरण कंपनियों, रेलवे, कोयला खदानों और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के निजीकरण का तीव्र विरोध। यूनियनों का कहना है कि इससे लाखों नौकरियां खतरे में पड़ेंगी।
- आर्थिक संकट और बेरोजगारी: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी, कम मजदूरी और आर्थिक असमानता के खिलाफ यूनियनों ने आवाज उठाई। वे न्यूनतम वेतन को लागू करने और रोजगार सृजन की मांग कर रहे हैं।
- ठेका प्रथा का अंत: अस्थायी और ठेका आधारित नौकरियों की बढ़ती प्रवृत्ति को यूनियनों ने “आधुनिक गुलामी” करार दिया। वे स्थायी नौकरियों और सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
- किसानों के लिए समर्थन: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी, कर्ज माफी और कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट दखलअंदाजी के खिलाफ मांगें भी इस बंद का हिस्सा थीं।
देशभर में हड़ताल का प्रभाव
- भारत बंद का प्रभाव देश में देखने को मिला। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु महानगरों से लेकर छोटे शहररों , कस्बों तक, सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ थी। कई जगहों पर सड़कें और रेलवे ट्रैक अवरुद्ध किए गए, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों में बंद का असर सबसे अधिक रहा, जहां ट्रेड यूनियनों और वामपंथी संगठनों की मजबूत उपस्थिति है। उत्तर प्रदेश, बिहार, और पंजाब में भी किसानों और मजदूरों ने संयुक्त रूप से सड़कों पर उतरकर अपनी मांगों को दोहराया।
- परिवहन: कई राज्यों में बस सेवाएं और ऑटो-टैक्सी सेवाएं ठप रहीं। रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा, क्योंकि कई ट्रेनें रद्द कर दी गईं या देरी से चलीं।
- बैंकिंग और डाक सेवाएं: सरकारी बैंकों और डाकघरों में कामकाज लगभग बंद रहा। कई जगहों पर निजी बैंक भी प्रभावित हुए।
- बिजली और अन्य सेवाएं: बिजली कर्मचारियों की हड़ताल ने कुछ क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति को प्रभावित किया। कोयला खदानों और अन्य औद्योगिक इकाइयों में भी उत्पादन पर असर पड़ा।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में छुट्टी रही, जबकि कुछ अस्पतालों में आपातकालीन सेवाएं ही संचालित हो सकीं।
सरकार और विपक्ष की प्रतिक्रिया
- केंद्र सरकार ने इस हड़ताल को “राजनीति से प्रेरित” करार देते हुए इसे खारिज करने की कोशिश की। श्रम मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि सरकार मजदूरों और किसानों के हित में कई योजनाएं चला रही है और उनकी मांगों पर विचार के लिए बातचीत को तैयार है। हालांकि, यूनियनों ने इस बयान को “खोखला” बताया
- विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस, वामपंथी दलों, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), और समाजवादी पार्टी ने इस हड़ताल को पूर्ण समर्थन दिया। विपक्षी नेताओं ने इसे “जनता की आवाज” और “आर्थिक अन्याय के खिलाफ लड़ाई” करार दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “यह बंद मजदूरों और किसानों की एकजुटता का प्रतीक है। सरकार को उनकी मांगें सुननी होंगी।” वामपंथी नेताओं ने भी सरकार पर कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
सोशल मीडिया पर तूफान
सोशल मीडिया पर #BharatBandh ट्रेंड पूरे दिन छाया रहा। लाखों लोगों ने अपनी राय, तस्वीरें और वीडियो साझा किए। कुछ ने हड़ताल को मजदूरों और किसानों के हक की लड़ाई बताया, तो कुछ ने इसे आम जनता के लिए असुविधा का कारण करार दिया। कई युवा कार्यकर्ताओं ने इसे “आर्थिक न्याय” और “सामाजिक समानता” की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। ट्विटर और इंस्टाग्राम पर प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें लोग सड़कों पर नारेबाजी करते और बैनर लहराते दिख रहे हैं।